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हम कॊ आता न था बयाँ हॊना, तुम नॆ भी जानना नही चाहा, बस सवालॊं मॆ ही रहॆ हम तुम.... कॊई चरचा न हमनॆ ही छॆडा़, कॊई किस्सा न तुम ही कह पायॆ, बस खयालॊं मॆ ही रहॆ हम तुम.... काश‌कॆ ह‌म‌ही दॊ क‌द‌म‌च‌लतॆ, काश‌कॆ तुम‌ही ईब्तिदा क‌रतॆ, ब‌स‌म‌लालॊं मॆ ही र‌हॆ ह‌म‌तुम‌.... ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ अपनॆ सायॆ सॆ मुँह छुपाता हुँ, कुछ सवालॊं सॆ भागता हुँ मैं, मैक़शी तॊ महज़ बहाना है.... उसकी बातॆ बयान करता हुँ, अपनॆ हिस्सॆ का सच छुपा करकॆ, शायरी तॊ महज़ बहाना है....  थी सज़ायॆं मॆरॆ मुक़द्दर मॆं, धड़कनॊ तुमसॆ क्या गिला करना, ज़िन्दगी तॊ महज़ बहाना है.... कॊइ चहरा निगाहॊं मॆ भरकर, तॆरा चहरा तलाश करता हुँ, दॊस्ती तॊ महज़ बहाना है....  मै लबॊं कॊ सियॆ हुऎ अक्सर, गुनगुनाता हुँ अपनी तन्हाई, खामुशी तॊ महज़ बहाना है....

फ़ना

 फ़ना न हो जाए यह सांस चल चल के, ये रात बुझ बुझ के, चराग जल जल के । के अब जो तनहाँ हूँ तो खूब फ़ुरसत है, मैं पहले रखता था हिसाब पल पल के । अमीर लोगों की अदा निराली है, दिवालिया हैं दिल, लिबास मलमल के ।

ग़लतियाँ

 बेख़ुदी की आग में पकने लगी हैं ग़लतियाँ, कितनी सौंधी आज फिर लगने लगी हैं ग़लतियाँ । मैं न था वो, जो बदल जाता ज़माने के लिए, होते होते आप ही, थकने लगी हैं ग़लतियाँ । मयकशी का दौर में ‘क़श’ होश की बातें ना कर, ग़लतियों के बोझ में दबने लगी लगी हैं ग़लतियाँ ।

सच्चाई की मूरत

सर चढ़कर के बैठा है, पारा-वारा सब, इल्ली-दिल्ली, अटना-पटना, आरा-वारा सब| 'आप' जो कह दे एहतराम के क़ाबिल हो जाए, 'उवी-मूवी', 'सिंगर-विंगर', चारा-वारा सब| कितनी फबती है 'क़श' सच्चाई की मूरत पे, 'अफलर-मफ्लर', आंसी-खांसी, नारा-वारा सब|

~~~~हैं भी और नही भी हैं~~~~

हम वहाँ हैं भी और नही भी हैं, दुरियाँ हैं भी और नही भी हैं.... खो गया है इसी शहर में कहिं, जो मेरा हैं भी और नही भी हैं.... एक दरिया के दोनो साहिल हैं, हम जुदा हैं भी और नही भी हैं.... बेदिली है तो बेदिली ही सही, हम खफा हैं भी और नही भी हैं.... उसने आखोँ से कह दिया वो मुझे, जनता हैं भी और नही भी हैं.... मिलने जुलने की खैर छोडो 'क़श' राबता हैं भी और नही भी हैं....
~~~~~~खामुशि~~~~~ जब जुबां हो गयी खामुशि, खुद बयाँ हो गयी खामुशि, जान पहचान तन्हाई से, ख़ामाखा हो गयी खामुशि, खामुशि, खामुशि, खामुशि, इंतेहाँ हो गयी खामुशि, लफ्ज़ बुझने लगे हैं मेरे, लो धुआँ हो गयी खामुशि, साथ चलती रही इस तरह, रास्ता हो गयी खामुशि, अपने चेहरे से मायूस थी, आईना हो गयी खामुशि, सबके होठों पे वाबस्ता "क़श", क्या थी क्या हो गयी खामुशि,  

ज़िंदगी तेरे सावालात समझने के लिए

तेरे मसले तेरे हालात समझने के लिए , मैँ हुँ खामोश तेरी बात समझने के लिए ... मेरी ग़ज़ले हो हैं आईना तेरी दुनिया का , मुझे पढ़िए मेरे जज़्बात समझने के लिए ... वो दिए जिनको अँधेरों पे तरस आता है , धूप में निक्लें तो औकात समझने के लिए ... साथ अपने ले गया तु मेरी सारी उलझन , अब खुशी है , न ही सदमात समझने के लिए ... तेरे आगोश - ए - तसव्वुर में फिर आया हुं ' क़श ', मीर ग़ालिब के ख़यालात समझने के लिए ....