ग़लतियाँ

 बेख़ुदी की आग में पकने लगी हैं ग़लतियाँ,

कितनी सौंधी आज फिर लगने लगी हैं ग़लतियाँ ।


मैं न था वो, जो बदल जाता ज़माने के लिए,

होते होते आप ही, थकने लगी हैं ग़लतियाँ ।


मयकशी का दौर में ‘क़श’ होश की बातें ना कर,

ग़लतियों के बोझ में दबने लगी लगी हैं ग़लतियाँ ।

Comments

Popular posts from this blog

ख़त

ज़िंदगी तेरे सावालात समझने के लिए