हम कॊ आता न था बयाँ हॊना,
तुम नॆ भी जानना नही चाहा,
बस सवालॊं मॆ ही रहॆ हम तुम....
कॊई चरचा न हमनॆ ही छॆडा़,
कॊई किस्सा न तुम ही कह पायॆ,
बस खयालॊं मॆ ही रहॆ हम तुम....
काशकॆ हमही दॊ कदमचलतॆ,
काशकॆ तुमही ईब्तिदा करतॆ,
बसमलालॊं मॆ ही रहॆ हमतुम....
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अपनॆ सायॆ सॆ मुँह छुपाता हुँ,
कुछ सवालॊं सॆ भागता हुँ मैं,
मैक़शी तॊ महज़ बहाना है....
उसकी बातॆ बयान करता हुँ,
अपनॆ हिस्सॆ का सच छुपा करकॆ,
शायरी तॊ महज़ बहाना है....
थी सज़ायॆं मॆरॆ मुक़द्दर मॆं,
धड़कनॊ तुमसॆ क्या गिला करना,
ज़िन्दगी तॊ महज़ बहाना है....
कॊइ चहरा निगाहॊं मॆ भरकर,
तॆरा चहरा तलाश करता हुँ,
दॊस्ती तॊ महज़ बहाना है....
मै लबॊं कॊ सियॆ हुऎ अक्सर,
गुनगुनाता हुँ अपनी तन्हाई,
खामुशी तॊ महज़ बहाना है....
ख़त
नाम लिखकर तेरा लिफाफे पर, खत मैं कोरा हि छोड आया हुं, खैर, तुमको तो सब पत होगा... ... याद है भिंगती सी शाम वो जुलाई की, सर छुपाने को रुक गये थे 'बस स्टाप' पे हम, कल भरी धूप में गुजरा वहाँ से तो मैने, तेरी परछायीं को अब भी वहीं रुका पाया, हाल अपना बताना चहता था पर मैने, ये सोंच कर निकल जाना ही मुनासिब समझा, छोडो, तुमको तो सब पत होगा... साल दो साल, बीते सितंबर, ग़ालिबन हम किसी जन्मदिन पर, इत्येफ़ाक़न मिले थे दो चेहरे, ढाई आखों के दरमियाँ छुपकर, वो झलक अब भी सुर्ख है गोया, मैं वहीं अब भी बुत सा ठहरा हूँ, तुम जहाँ छोड़ गए थे आख़िर, जो अब मैं उठ के दायें बाएं कहीं, निकल जाऊँ बिना बताए कहीं, क्या मिलेगा तुम्हें सुराग मेरा ? खैर तुमको तो सब पता होगा…. इक दिसम्बर कि सुबह नामबर हवायें जब, तेरे आँगन मे उडा लायी थी लिहाफ मेरा, याद है तुमने कहा था उसे लौटाते हुए, " युं छत पे खत न सुखाया किजे, खत को मंजिल का पता होता है" जो अब समेटकर पिछली सभी मुलाकतें, शाम वाली, पार्क वाली, मार्च वाली, मैं बेपता ही छोड आऊँ अगर, बोलो तुमको पता चलेगा क्या? खैर तुमको तो सब पता होगा….
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