फिर अकेला हो गया हुं, भिड के मंज़र में आकर,
इक किरायेदार सा, किराये के शहर मे आकर,
क्या बताउं अपनी मिट्टी को कहाँ मशरूफ हुं,
घर कि रोटी छोड़ दी है, पेट के चक्कर में आकर,
दोस्तों के साथ गुज़रा वक़्त कितना मुख्तसर था,
ये पता चलता है अक्सर, अगले दिन दफ़्तर मे आकर,
जागते ख्वबों-खयलों ने सवेरा कर दिया,
सो गयी होगी अकेले नींद भी बिस्तर में आकर,
जो तुम्हारे साथ पी 'coffee' तो ये जाना है 'क़श',
अच्छी लगने लगती हैं क्यों तल्खियाँ, शक्कर मे आकर....
इक किरायेदार सा, किराये के शहर मे आकर,
क्या बताउं अपनी मिट्टी को कहाँ मशरूफ हुं,
घर कि रोटी छोड़ दी है, पेट के चक्कर में आकर,
दोस्तों के साथ गुज़रा वक़्त कितना मुख्तसर था,
ये पता चलता है अक्सर, अगले दिन दफ़्तर मे आकर,
जागते ख्वबों-खयलों ने सवेरा कर दिया,
सो गयी होगी अकेले नींद भी बिस्तर में आकर,
जो तुम्हारे साथ पी 'coffee' तो ये जाना है 'क़श',
अच्छी लगने लगती हैं क्यों तल्खियाँ, शक्कर मे आकर....
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