मेरे हाथो मे लिक्खी है फ़ज़ीहत और अभी शायद,
मेरे आगे खुलेगी ये हक़ीक़त और अभी शायद,

... वो आए पास बैठे पर हमारा हाल ना पूछा,
उन्हे लगता है बिगड़ेगी तबीयत और अभी शायद,

न कुछ बोले, मगर देखा किए वो जिन निगहों से,
लगा की उमने बाकी है शिकायत और अभी शायद 

ये हन्गामो के मुर्दे तुम जो दफ़नाने नही देते,
लहू उनका बहाएगी सियासत और अभी शायद,

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नामुकम्मल सही आधा-पौना तो हो,
मेरी मिट्टी का कुछ हिस्सा सोना तो हो,

रिश्ते खाली लिफफों से लगते है क्यों,
गोया हुज़्ज़्त् ही कर रोना धोना तो हो,

जीतने हारने की फ़िक़र छोड़ दे,
ज़िंदगी खेल है तू खिलौना तो हो,

क्या पता रहता हो पत्थरो मे खुदा,
थोड़ा सर तो झुका, थोड़ा बौना तो हो,

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