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Showing posts from December, 2021

फ़ना

 फ़ना न हो जाए यह सांस चल चल के, ये रात बुझ बुझ के, चराग जल जल के । के अब जो तनहाँ हूँ तो खूब फ़ुरसत है, मैं पहले रखता था हिसाब पल पल के । अमीर लोगों की अदा निराली है, दिवालिया हैं दिल, लिबास मलमल के ।

ग़लतियाँ

 बेख़ुदी की आग में पकने लगी हैं ग़लतियाँ, कितनी सौंधी आज फिर लगने लगी हैं ग़लतियाँ । मैं न था वो, जो बदल जाता ज़माने के लिए, होते होते आप ही, थकने लगी हैं ग़लतियाँ । मयकशी का दौर में ‘क़श’ होश की बातें ना कर, ग़लतियों के बोझ में दबने लगी लगी हैं ग़लतियाँ ।