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Showing posts from May, 2013
मेरे हाथो मे लिक्खी है फ़ज़ीहत और अभी शायद, मेरे आगे खुलेगी ये हक़ीक़त और अभी शायद, ... वो आए पास बैठे पर हमारा हाल ना पूछा, उन्हे लगता है बिगड़ेगी तबीयत और अभी शायद, न कुछ बोले, मगर देखा किए वो जिन निगहों से, लगा की उमने बाकी है शिकायत और अभी शायद  ये हन्गामो के मुर्दे तुम जो दफ़नाने नही देते, लहू उनका बहाएगी सियासत और अभी शायद, ______________________________ _____ नामुकम्मल सही आधा-पौना तो हो, मेरी मिट्टी का कुछ हिस्सा सोना तो हो, रिश्ते खाली लिफफों से लगते है क्यों, गोया हुज़्ज़्त् ही कर रोना धोना तो हो, जीतने हारने की फ़िक़र छोड़ दे, ज़िंदगी खेल है तू खिलौना तो हो, क्या पता रहता हो पत्थरो मे खुदा, थोड़ा सर तो झुका, थोड़ा बौना तो हो,

ख़त

नाम लिखकर तेरा लिफाफे पर, खत मैं कोरा हि छोड आया हुं, खैर, तुमको तो सब पत होगा... ... याद है भिंगती सी शाम वो जुलाई की, सर छुपाने को रुक गये थे 'बस स्टाप' पे हम, कल भरी धूप में गुजरा वहाँ से तो मैने, तेरी परछायीं को अब भी वहीं रुका पाया, हाल अपना बताना चहता था पर मैने, ये सोंच कर निकल जाना ही मुनासिब समझा, छोडो, तुमको तो सब पत होगा... साल दो साल, बीते सितंबर, ग़ालिबन हम किसी जन्मदिन पर,  इत्येफ़ाक़न मिले थे दो चेहरे,  ढाई आखों के दरमियाँ छुपकर, वो झलक अब भी सुर्ख है गोया, मैं वहीं अब भी बुत सा ठहरा हूँ,  तुम जहाँ छोड़ गए थे आख़िर, जो अब मैं उठ के दायें बाएं कहीं, निकल जाऊँ बिना बताए कहीं, क्या मिलेगा तुम्हें सुराग मेरा ? खैर तुमको तो सब पता होगा…. इक दिसम्बर कि सुबह नामबर हवायें जब, तेरे आँगन मे उडा लायी थी लिहाफ मेरा, याद है तुमने कहा था उसे लौटाते हुए, " युं छत पे खत न सुखाया किजे, खत को मंजिल का पता होता है" जो अब समेटकर पिछली सभी मुलाकतें, शाम वाली, पार्क वाली, मार्च वाली, मैं बेपता ही छोड आऊँ अगर, बोलो तुमको पता चलेगा क्या?  खैर तुमको तो सब पता होगा….
फिर अकेला हो गया हुं, भिड के मंज़र में आकर, इक किरायेदार सा, किराये के शहर मे आकर, क्या बताउं अपनी मिट्टी को कहाँ मशरूफ हुं, घर कि रोटी छोड़ दी है, पेट के चक्कर में आकर, दोस्तों के साथ गुज़रा वक़्त कितना मुख्तसर था, ये पता चलता है अक्सर, अगले दिन दफ़्तर मे आकर, जागते ख्वबों-खयलों ने सवेरा कर दिया, सो गयी होगी अकेले नींद भी बिस्तर में आकर, जो तुम्हारे साथ पी 'coffee' तो ये जाना है 'क़श', अच्छी लगने लगती हैं क्यों तल्खियाँ, शक्कर मे आकर....